रेडियो-कॉलर की मदद से अब की जायेगी जंगलों में शेरों की सुरक्षा…गुजरात सरकार गिर के जंगलों में शेरों की सुरक्षा को लेकर सतर्क हो चुकी है। गिर के जंगलों में एशियाई शेरों पर रेडियो-कॉलर लगाए जा रहे हैं। इन रेडियो-कॉलर की मदद से एशियाई शेरों की गतिविधियों पर नजर रखी जाएगी। उनके चलने-फिरने और अन्य जरूरी क्रियाकलापों का अध्ययन रेडियो-कॉलर के जरिए किया जा रहा है। गिर के जंगलों में शेरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इन कॉलरों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

वन विभाग के अधिकारी ने रेडियो-कॉलर और उसके उपयोग की सारी जानकारी दी है। अधिकारी ने कहा कि जर्मनी से इन कॉलर को आयात किया गया है। हर रेडियो-कॉलर की कीमत 6 लाख से अधिक बताई जा रही है। उन्होंने कहा कि अब तक 25 शेरों को कॉलर किया गया है। हमारी योजना है कि हम 50 और कॉलर पर काम करें।

जंगली जानवरों की निगरानी के लिए रेडियो-कॉलर का इस्तेमाल किया जाता है। निगरानी के सबसे सामान्य तरीकों में से इसे एक माना जाता है। शोधकर्ताओं और प्रबंधकों को इसकी मदद से अपना काम आसान बना लेते हैं। जानवरों से संबंधित आंकड़े इकट्ठे करने में इसकी उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता है। इन रेडियो-कॉलर की वजह से व्यवहार, आहार और रोजमर्रा की जानवरों की गतिविधियों के आंकड़े जुटाने में सफलता मिलती है।

गिर के शेर मनुष्यों के नियमित संपर्क में रहते हैं। इस कारण से भी इन पर रेडियो-कॉलर लगाए जा रहे हैं। इससे अवैध शेर के शो पर लगाम कसी जाएगी। ये रेडियो-कॉलर जानवर का पता लगाने में वन विभाग की मदद करेंगे। शेर के बीमार होने पर समय पर इलाज मुहैया कराया जाएगा। विभाग पांच जिलों के जंगलों के शेरों पर रेडियो-कॉलर लगा रहा है। इन पांच जिलों में गिर सोमनाथ, जूनागढ़, अमरेली, भावनगर और बोटाद शामिल हैं।

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