पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने एक केस की सुनवाई करतेेे हुए कहा कि बेटी का डीएनए टेस्ट कराने की मांग करना समाज की गलत सोच को दिखाता है। अपने दायित्वों से बचने के लिए बेटी का डीएनए टेस्ट कराने की मांग करना कहीं से भी उचित नहीं है। हाईकोर्ट में एक व्यक्ति ने याचिका दायर की थी जिसमें डीएनए टेस्ट कराने की अपील की गई थी।

हाईकोर्ट ने याची की याचिका को खारिज कर दिया है। याची ने निचली अदालत में पत्नी के खिलाफ केस किया था। पत्नी पर आ’रोप लगाते हुए कहा था कि इसके किसी दूसरे शख्स से संबंध हैं। निचली अदालत में याची के आ’रोप साबित नहीं हो पाए थे। याची को अपनी बेटी को दो हजार रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने के आदेश दिए गए थे।

इसी आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में अपील की थी। अपनी अपील में उसने कहा था कि वह उसकी बायोलॉजिकल बेटी नहीं है। इसलिए वह उसको गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य नहीं है। हाईकोर्ट ने इस पर कहा कि याचिका को स्वीकार किया गया तो वह न्याय की ह’त्या जैसा होगा। बेटी का डीएनए टेस्ट कराने के लिए इजाजत देना उसे जिंदगी भर की मानसिक तक’लीफों से जोड़ देगा। दाखिल की गई इस याचिका को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

हाईकोर्ट ने याची पर कड़ी टिप्पणी करते हुए याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। याची ने हाईकोर्ट के आदेश के बाद दोबारा इस पर सुनवाई की अपील नहीं की है। पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर न्याय की परिभाषा पर विश्वास दिलाया है। समाज में फैलती गं’दी मानसिकता पर ह’मला करने का प्रयास किया है। यह संदेश दिया है कि मानवता अभी भी जिंदा है।

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