हालांकि बुद्धिमान होना कुदरत की नियामत होती है लेकिन कुछ खास चीजों पर ध्यान दें तो आप भी बच्चों की दिमागी क्षमता को बढ़ा सकते हैं।अगर आप अपने बच्चे की ब्रेन पावर बढ़ाना चाहते हैं तो उसके खानपान, दिनचर्या और आसपास के माहौल पर ध्यान दें। विशेषज्ञों के अनुसार जो बच्चे घर का बना ताजा भोजन करते हैं और पर्याप्त पानी पीते हैं, उनकी एकाग्रता क्षमता बनी रहती है और वे क्लास में अच्छा प्रदर्शन करते हैं।

पारंपरिक हो नाश्ता –
‘ब्रेन बायो सेंटर’ के न्यूट्रीशनल थैरेपिस्ट डेबोरा कॉल्सन के मुताबिक ज्यादा शुगर और कार्बोहाइड्रेट्स युक्त भोजन शरीर मेें थकावट व एकाग्रता की कमी का कारण बनता है इसलिए इनसे बचना चाहिए। बच्चों को नाश्ते में लापसी, राबड़ी जैसी पारंपरिक चीजें देनी चाहिए। ये चीजें बच्चों के रक्त में धीरे-धीरे शुगर घोलती हैं जिससे उन्हें आवश्यकतानुसार ऊर्जा मिलती रहती है। इसके अलावा बच्चे के नाश्ते, लंच और डिनर का टाइम फिक्स होना चाहिए जिससे उन्हें बार-बार भूख न लगे।

डिब्बाबंद पेय न दें –
बच्चे को कैफीनयुक्त बोतलबंद पेय या कृत्रिम रंगों से युक्त खाद्य पदार्थ न दें। इन पदार्थों से नींद पर बुरा असर पडऩे के अलावा एकाग्रता भी भंग होती है। साथ ही ये बच्चों की हड्डियों पर भी बुरा असर डालते हैं। इनकी बजाय ताजा फल, सब्जियां, दाल, सूखे मेवे, मूंगफली, चना, लोबिया, दालें आदि खिलाएं। बच्चे के भोजन की प्लेट में चौथाई भाग प्रोटीन, चौथाई भाग स्टार्च और आधा भाग सब्जियों का होना चाहिए।

अच्छी आदतें डालें –
खाना खाने से पहले और बाद में बच्चे के हाथ जरूर धुलवाएं। बच्चे में खाने के बाद कुल्ला करने और रात को सोने से पहले ब्रश करने की आदत डालें। छुट्टी वाले दिन बच्चे को अपनी किताबों की अलमारी साफ करने और फटी किताबों या कॉपी को सुधार करने के लिए कहें। इससे बच्चा जिम्मेदारी को समझकर व्यवस्थित तरीके से काम करना सीखता है।

तनाव न होने दें –
आजकल 4-11 साल के बच्चों में बड़ों की मानसिक बीमारियां जैसे डिप्रेशन, जनरल एंग्जाइटी डिसऑर्डर, ऑब्सेशन कम्पलसिव डिसऑर्डर और बाइपोलर डिसऑर्डर आदि होने लगी हैं। इसके लिए काफी हद तक माता-पिता, विज्ञापन और ‘टैलेंट हंट’ जैसे टीवी प्रोग्राम जिम्मेदार हैं। माता-पिता को चाहिए कि वे तीन साल की उम्र के बाद ही बच्चे को कोई एक्टिीविटी क्लास जॉइन कराएं ताकि वह कम्यूनिकेशन करने के लायक हो जाए। यदि क्लास में उसे चीजें समझ ना आएं, उसका मजाक उड़े या बाकी लोगों के साथ तालमेल ना बैठे तो वह घर पर साफ-साफ बता सके।

गैजेट्स का प्रयोग हो सीमित –
अमरीका की बाल रोग एकेडमी के अनुसार बच्चों को दिनभर में दो घंटे से ज्यादा लैपटॉप का इस्तेमाल या वीडियोगेम्स नहीं खेलने दें। इससे एक तो बच्चे की फिजिकल एक्टिविटीज कम हो जाती है, दूसरा कई बार वह माता-पिता की अनदेखी में इंटरनेट पर गलत चीजों तक पहुंच जाता है जिससे उसके दिमाग पर दुष्प्रभाव पड़ता है। इसलिए बच्चे के लैपटॉप या कम्प्यूटर इस्तेमाल करने के समय को तय करें और इस दौरान उसपर ध्यान दें।

खेलकूद भी जरूरी –
खेलना बच्चों के शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक विकास के लिए भी जरूरी है। इससे बच्चा जहां फिजिकली फिट होता है वहीं दोस्तों के साथ मिलकर खेलने से उसमें टीम भावना आती है व एकाग्रता में भी वृद्धि होती है। इसके अलावा परीक्षा के दिनों में बच्चों को पर्याप्त नींद लेनी चाहिए क्योंकि सोने के दौरान हमारा मस्तिष्क उन बातों को अनकोड करता है जो सोने से पहले पढ़ी या याद की गई थी इसलिए सात घंटे की नींद जरूरी लें।

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